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Monday, January 20, 2014
मदद में स्वार्थ नहीं ढूंढे ...
जनवरी कि एक सर्द शाम को मेरे शहर भोपाल में बादल खूब जम कर बरस चुके थे । मैंने जब देखा कि बारिश और हो सकती है तो मैंने अपना सारा सामान अपने वॉटर-प्रूफ़ बैग में डाला और मैं निकल पड़ा अपने ऑफिस से घर जाने के लिये । मेरे ऑफिस और घर के रास्ते में एक रेलवे क्रासिंग पड़ती है और मुख्य मार्ग से उस क्रासिंग तक जाने के दो रास्ते हैं । एक रास्ता जिसको हम पक्का रास्ता बोल सकते है क्योंकि उस पर बहुत ज्यादा टूटी-फूटी ही सही मगर एक सड़क बनी हुई है और एक मिट्टी का कच्चा रास्ता है जो किसी ने बनाया नहीं है अपने आप बन गया है और जब बारिश न हो तब वो रास्ता पक्के रास्ते से ज्यादा समतल रहता है ।
जब मैं बाइक निकालने की कोशिश कर रहा था तभी मुझे उस ओर एक और बाइक आती नज़र आयी । मैंने उसे तुरंत रुकने का इशारा किया और बोला कि," यहाँ मत आओ, बहुत ज्यादा कीचड़ है और तुम बाइक समेत फंस जाओगे " तो उस पर सवार लड़के ने अपनी बाइक तुरंत रोक दी और कुछ दूर पैदल चल कर मेरी तरफ आने लगा । मैंने उसके पहनावे को देख कर कहा कि, "यहाँ मत आओ तुम्हारे जूते और कपडे कीचड़ में ख़राब हो जायेंगे, जैसे मेरे हो गए हैं "। मेरा ये बोलने के बाद जो उस लड़के ने बोला वो मेरे मानस पटल पर बहुत गहरी छाप छोड़ गया, वो बोला कि, " भैया अगर आप मुझे नहीं रोकते तो मेरे जूते और कपडे तो ख़राब होने ही थे, आपके बोलने के कारण मेरी बाइक इस कीचड़ में फंसने से बच गयी और आपकी बाइक भारी है आप अकेले नहीं निकाल पाओगे" ।
तो मैं जब उस रेलवे क्रासिंग के करीब पहुँच रहा था तब बारिश के बावजूद मैंने पता नहीं क्यों उस कच्चे रास्ते हो चुन लिया और कुछ दूरी पार करते ही मैं अपनी बाइक समेत कीचड़ में बुरी तरह से फंस गया । मैंने देखा कुछ दूरी पर एक और व्यक्ति फंसा हुआ था और अपनी बाइक कीचड़ से निकालने कि कोशिश कर रहा था । मैं भी अपनी बाइक निकालने कि कोशिशों में जुट गया ।
जब मैं बाइक निकालने की कोशिश कर रहा था तभी मुझे उस ओर एक और बाइक आती नज़र आयी । मैंने उसे तुरंत रुकने का इशारा किया और बोला कि," यहाँ मत आओ, बहुत ज्यादा कीचड़ है और तुम बाइक समेत फंस जाओगे " तो उस पर सवार लड़के ने अपनी बाइक तुरंत रोक दी और कुछ दूर पैदल चल कर मेरी तरफ आने लगा । मैंने उसके पहनावे को देख कर कहा कि, "यहाँ मत आओ तुम्हारे जूते और कपडे कीचड़ में ख़राब हो जायेंगे, जैसे मेरे हो गए हैं "। मेरा ये बोलने के बाद जो उस लड़के ने बोला वो मेरे मानस पटल पर बहुत गहरी छाप छोड़ गया, वो बोला कि, " भैया अगर आप मुझे नहीं रोकते तो मेरे जूते और कपडे तो ख़राब होने ही थे, आपके बोलने के कारण मेरी बाइक इस कीचड़ में फंसने से बच गयी और आपकी बाइक भारी है आप अकेले नहीं निकाल पाओगे" ।
फिर उसने मेरी बाइक निकलने में मेरी मदद की, बिना किसी झिझक और परवाह किये । मेरी बाइक निकलवाने के बाद उस लड़के ने उस दूसरे व्यक्ति कि भी मदद कि और उसकी बाइक भी बाहर निकलवा दी । फिर वो लड़का बोला कि, " भैया अब आप पहियों को थोड़ा साफ़ करके घर जा सकते हो", और ऐसा कह कर वो अपनी बाइक ले कर चला गया । वैसे तो मैंने उस लड़के को धन्यवाद बोला था उसकी इस मदद के लिए लेकिन मुझे अब भी लग रहा है कि शायद वो धन्यवाद कम था । इस उहापोह कि स्थिति में मैं उस लड़के से उसका नाम भी पूछना भूल गया और ये बात मुझे शायद पूरी ज़िन्दगी परेशान करेगी ।
एक न भूलने वाला सबक वो मुझे दे गया था कि आप जिस तरह और जितनी मदद कर सकते हो करो और मदद के समय ये मत देखो कि आप जिसकी मदद कर रहे हो वो आपका परिचित है या नहीं ...
धन्यवाद दोस्त... ईश्वर करे कि मैं तुमसे दुबारा मिलने का मौका मिले और धन्यवाद मुझे ये सीखने के लिखे कि मदद निस्वार्थ भाव से भी कि जा सकती है ।
यह घटना मेरे साथ जनवरी १८, २०१४ को बावर्ची ढाबे के पास होशंगाबाद रोड पर शाम ६:३० के आस-पास घटित हुई थी ।
Wednesday, January 15, 2014
भारतीय राजनीति : आजकल
भारतीय राजनीति आजकल एक नए दौर से गुजर रही है । इस नए दौर में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं । अरविन्द केजरीवाल ने जब से आम आदमी पार्टी या यूँ कहे कि आप का गठन किया है तब से इस दौर कि शुरुआत मानी जा सकती है । जब आप का गठन हुआ था तब सभी पार्टियों ने इस नयी पहल को बहुत हलके में था लेकिन दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों के बाद स्थितियाँ बहुत बदल गयी है ।
दिल्ली विधानसभा चुनावों ने भारत कि सभी राजनैतिक पार्टियों को एक अति-महत्वपूर्ण सिख दी है कि सुधर जाओ नहीं तो खत्म कर दिए जाओगे । वैसे दिल्ली केजरीवाल का कर्मक्षेत्र रहा है और मेरे हिसाब से सिर्फ वहाँ मिली सफलता से आप को अतिउत्साहित नहीं होना चाहिए जो कि आजकल नज़र आ रहा है ।
कुमार विश्वास का अमेठी से चुनाव लड़ना मेरे हिसाब से उस अति उत्साह का ही नतीज़ा है । आप को लगता है कि जैसे वो दिल्ली में शीला दीक्षित को हरा सकते है वैसे ही अमेठी में राहुल गांधी को हरा देंगे तो मेरा यह मानना है कि शीला दीक्षित को खुद अरविन्द केजरीवाल ने हराया था और कुमार विश्वास चाह कर भी केजरीवाल नहीं बन सकते है । अमेठी में राहुल गांधी ने एक सांसद के तौर पर बहुत काम किया है और उनकी पार्टी कि धूमिल होती छवि से उन्हें शायद ही कोई व्यक्तिगत नुक़सान हो ।
आप नेता योगेन्द्र यादव जी का कहना कहना है कि मुकाबला आप और बीजेपी में है और कांग्रेस कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं । योगेन्द्र जी कांग्रेस का तो इस बार बुरा हाल होना तय था चाहे आप होती या न होती, आप के आ जाने से नुक़सान बीजेपी को ही होगा । मुझे और बीजेपी के ताज़ा बयानों को देख कर ऐसा लगता है कि आप और बीजेपी कि लड़ाई में कांग्रेस को फायदा हो सकता है क्योंकि आप के आने से बीजेपी का वोट बैंक आप की तरफ जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो कम वोट के सहारे ही सही कांग्रेस नुकसान को कम सकती है । भैया ऐसा है कि दो बिल्लियों कि लड़ाई में अक्सर फायदा बन्दर को हो जाता है ।
नमो आप से डर गए है क्योंकि यदि आप ने उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतार दिए तो नुक़सान सबसे ज्यादा बीजेपी को ही होगा । उत्तर प्रदेश में आप समेत ५ पार्टियां प्रमुखता से चुनाव लड़ेंगी और सपा-बसपा के वजूद को नकारना गलत होगा । महाराष्ट्र में तो शिव सेना, राज ठाकरे, एन सी पी की पकड़ बहुत ज्यादा है तभी तो बीजेपी को शिव सेना और कांग्रेस को एन सी पी का सहारा है । हाँ मध्य प्रदेश और गुजरात में कोई बड़ा नुक़सान बीजेपी को होता नज़र नहीं आ रहा है लेकिन नमो को प्रधानमंत्री बनना है तो बीजेपी को एकला चलो ही अपनाना पड़ेगा ।
वैसे आप और कांग्रेस दोनों आजकल एक ही समस्या से दो चार हो रहे है और वो है उनके भस्मासुर । दोनों ही पार्टियों के पास भस्मासुरों कि कमी नहीं और अगर समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो दोनों को नुकसान होना तय है । मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ आप या कांग्रेस को भस्मासुरों बताने ज़रूरी हैं ।
अंततः मुझे जो समझ आया है अभी तहतक वो यह है कि बीजेपी पूरी ताकत से नमो को प्रधानमंत्री बनाना छह रही है, कांग्रेसी राहुल पार्को जितवाने कि कोशिश करने की जगह उनसे ये उम्मीद पाले बैठे है कि ये हमें जितवाएगा और आप तो बस आप है उनको क्या कहें...
दिल्ली विधानसभा चुनावों ने भारत कि सभी राजनैतिक पार्टियों को एक अति-महत्वपूर्ण सिख दी है कि सुधर जाओ नहीं तो खत्म कर दिए जाओगे । वैसे दिल्ली केजरीवाल का कर्मक्षेत्र रहा है और मेरे हिसाब से सिर्फ वहाँ मिली सफलता से आप को अतिउत्साहित नहीं होना चाहिए जो कि आजकल नज़र आ रहा है ।
कुमार विश्वास का अमेठी से चुनाव लड़ना मेरे हिसाब से उस अति उत्साह का ही नतीज़ा है । आप को लगता है कि जैसे वो दिल्ली में शीला दीक्षित को हरा सकते है वैसे ही अमेठी में राहुल गांधी को हरा देंगे तो मेरा यह मानना है कि शीला दीक्षित को खुद अरविन्द केजरीवाल ने हराया था और कुमार विश्वास चाह कर भी केजरीवाल नहीं बन सकते है । अमेठी में राहुल गांधी ने एक सांसद के तौर पर बहुत काम किया है और उनकी पार्टी कि धूमिल होती छवि से उन्हें शायद ही कोई व्यक्तिगत नुक़सान हो ।
आप नेता योगेन्द्र यादव जी का कहना कहना है कि मुकाबला आप और बीजेपी में है और कांग्रेस कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं । योगेन्द्र जी कांग्रेस का तो इस बार बुरा हाल होना तय था चाहे आप होती या न होती, आप के आ जाने से नुक़सान बीजेपी को ही होगा । मुझे और बीजेपी के ताज़ा बयानों को देख कर ऐसा लगता है कि आप और बीजेपी कि लड़ाई में कांग्रेस को फायदा हो सकता है क्योंकि आप के आने से बीजेपी का वोट बैंक आप की तरफ जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो कम वोट के सहारे ही सही कांग्रेस नुकसान को कम सकती है । भैया ऐसा है कि दो बिल्लियों कि लड़ाई में अक्सर फायदा बन्दर को हो जाता है ।
नमो आप से डर गए है क्योंकि यदि आप ने उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अपने उम्मीदवार उतार दिए तो नुक़सान सबसे ज्यादा बीजेपी को ही होगा । उत्तर प्रदेश में आप समेत ५ पार्टियां प्रमुखता से चुनाव लड़ेंगी और सपा-बसपा के वजूद को नकारना गलत होगा । महाराष्ट्र में तो शिव सेना, राज ठाकरे, एन सी पी की पकड़ बहुत ज्यादा है तभी तो बीजेपी को शिव सेना और कांग्रेस को एन सी पी का सहारा है । हाँ मध्य प्रदेश और गुजरात में कोई बड़ा नुक़सान बीजेपी को होता नज़र नहीं आ रहा है लेकिन नमो को प्रधानमंत्री बनना है तो बीजेपी को एकला चलो ही अपनाना पड़ेगा ।
वैसे आप और कांग्रेस दोनों आजकल एक ही समस्या से दो चार हो रहे है और वो है उनके भस्मासुर । दोनों ही पार्टियों के पास भस्मासुरों कि कमी नहीं और अगर समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो दोनों को नुकसान होना तय है । मुझे नहीं लगता कि मुझे यहाँ आप या कांग्रेस को भस्मासुरों बताने ज़रूरी हैं ।
अंततः मुझे जो समझ आया है अभी तहतक वो यह है कि बीजेपी पूरी ताकत से नमो को प्रधानमंत्री बनाना छह रही है, कांग्रेसी राहुल पार्को जितवाने कि कोशिश करने की जगह उनसे ये उम्मीद पाले बैठे है कि ये हमें जितवाएगा और आप तो बस आप है उनको क्या कहें...
Thursday, December 30, 2010
कुछ अलग करना चाहता हूँ...
करीब-करीब साल भर बाद आज थोडा वक़्त मिला है कुछ लिखने लायक पर बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा है कि क्या लिखा जाए | साल भर में परिस्थितियां बहुत बदल सी गयी लगती है जैसे अब शादीशुदा हूँ और इस बात को हँसते हुए बताऊ या रोते हुए पता नहीं...
अब कुछ बड़ा करने का मन कर रहा है समथिंग रिअली बिग... आजकल ऑफिस में तो ऐसा लगता है जैसे टाइम पास करने आये हुए है और बदकिस्मती से वह भी नहीं कर पाते है और जैसे मन उकताहट कि परिकाष्ठा से गुजर रहा है | आज मैं हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म देख रहा था तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि १९७० के दशक में भी भारतीय एनिमेशन बहुत अच्छा हुआ करता था, शायद आपको याद हो " एक चिड़ियाँ अनेक चिड़ियाँ...", हांजी ये हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म थी | वैसे आप सोच रहे होंगे कि मैंने बात कि शुरुआत कहा से कि थी और मैं बात को कहाँ ले गया या ले जा रहा हूँ पर क्या करू कुछ लिखना चाहता हूँ और समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखना चाह रहा हूँ :(
कल सोच रहा था कि थोडा स्मिथ को भला-बुरा बोलू, वैसे भला तो क्या बोलता बुरा कि बोलता अगर बोलता तो क्योंकि मैं एक आलोचक हूँ और ऐसा मैं नहीं कहता मेरे आस पास वाले कहते हैं | आजकल लोग ये भूल गए है कि "निंदक नियरे रखिये..." वैसे मुझे कहीं बाहर भी नहीं जाना पड़ता है क्योंकि कुछ लोग मेरे घर में ही मिल जाते है इस तरह के जो निंदक पास नहीं रखना चाहते हैं | मुझसे लोग कहते है कि मैं किसी कि नहीं सुनता पर कोई ये जाने कि कोशिश नहीं करता कि क्यों नहीं सुनता हूँ |
आजकल सबको यही लगता है कि सिर्फ वह ही सही है तो ये मुझे भी लगे कि मैं ही सही हूँ तो इसमें गलत क्या हैं? सब केवल गल्तियाँ गिनाते है तो मैं भी गिनाता हू और इसमें गलत क्या है ????
आज भी मेरे ऑफिस में कुछ काम नहीं हुआ क्योंकि विदेश में सब क्रिसमस और न्यू इयर जो बना रहे है और हम यहाँ रोज़ ८ घंटे उनका इन्तजार कर रहे है कि उनका बन जाए तो हम काम चालू करे क्यों ऑफिस तो आना ही है चाहे काम हो या ना हो |
वैसे अगले कुछ दिनों में मैं कुछ लिखू ना लिखू इसलिए अभी लिख देता हूँ कि हर उस को नव वर्ष कि शुभकामनायें जो गलती से मेरे इस ब्लॉग को पढ़ रहा हैं |
चलिए हुआ तो घर जा कर कुछ लिखने कि कोशिश करूँगा...
अब कुछ बड़ा करने का मन कर रहा है समथिंग रिअली बिग... आजकल ऑफिस में तो ऐसा लगता है जैसे टाइम पास करने आये हुए है और बदकिस्मती से वह भी नहीं कर पाते है और जैसे मन उकताहट कि परिकाष्ठा से गुजर रहा है | आज मैं हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म देख रहा था तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था कि १९७० के दशक में भी भारतीय एनिमेशन बहुत अच्छा हुआ करता था, शायद आपको याद हो " एक चिड़ियाँ अनेक चिड़ियाँ...", हांजी ये हिंदुस्तान में बनी पहली एनिमेशन फिल्म थी | वैसे आप सोच रहे होंगे कि मैंने बात कि शुरुआत कहा से कि थी और मैं बात को कहाँ ले गया या ले जा रहा हूँ पर क्या करू कुछ लिखना चाहता हूँ और समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखना चाह रहा हूँ :(
कल सोच रहा था कि थोडा स्मिथ को भला-बुरा बोलू, वैसे भला तो क्या बोलता बुरा कि बोलता अगर बोलता तो क्योंकि मैं एक आलोचक हूँ और ऐसा मैं नहीं कहता मेरे आस पास वाले कहते हैं | आजकल लोग ये भूल गए है कि "निंदक नियरे रखिये..." वैसे मुझे कहीं बाहर भी नहीं जाना पड़ता है क्योंकि कुछ लोग मेरे घर में ही मिल जाते है इस तरह के जो निंदक पास नहीं रखना चाहते हैं | मुझसे लोग कहते है कि मैं किसी कि नहीं सुनता पर कोई ये जाने कि कोशिश नहीं करता कि क्यों नहीं सुनता हूँ |
आजकल सबको यही लगता है कि सिर्फ वह ही सही है तो ये मुझे भी लगे कि मैं ही सही हूँ तो इसमें गलत क्या हैं? सब केवल गल्तियाँ गिनाते है तो मैं भी गिनाता हू और इसमें गलत क्या है ????
आज भी मेरे ऑफिस में कुछ काम नहीं हुआ क्योंकि विदेश में सब क्रिसमस और न्यू इयर जो बना रहे है और हम यहाँ रोज़ ८ घंटे उनका इन्तजार कर रहे है कि उनका बन जाए तो हम काम चालू करे क्यों ऑफिस तो आना ही है चाहे काम हो या ना हो |
वैसे अगले कुछ दिनों में मैं कुछ लिखू ना लिखू इसलिए अभी लिख देता हूँ कि हर उस को नव वर्ष कि शुभकामनायें जो गलती से मेरे इस ब्लॉग को पढ़ रहा हैं |
चलिए हुआ तो घर जा कर कुछ लिखने कि कोशिश करूँगा...
Friday, February 19, 2010
व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे
आज सोचा की अपने बारे में कुछ लिखा जाए. वो क्या है ना कि बहुत दिनों से कुछ लोग मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ ध्यान दीजियेगा मेरे द्वारा कि गयी आलोचनाओ से प्रभावित हो कर मुझसे बोल रहे थे कि मैं व्यंग्य लिखना शुरू क्यों नहीं करता हूँ तो अनायास ही मैं बोल पड़ा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे" हांजी बिलकुल सही सुना आपने कि मैंने कहा कि "व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे".
अब जो लोग हमारी तरह लापता गंज के प्रशंसक है वो लोग तो कहेंगे कि लो मारा डायलाग इसने लापता गंज से चुरा कर, लेकिन दोस्त ये सही बात है कि वाकई व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे और आज हम लिखने पढने में जो भी है कही ना कही उनके कारण ही है, उनको देख कर ही हमने सिखा है कि अगर हमे अपनी बात व्यंग्यात्मक कहना है तो हम कैसे कह सकते है लेकिन मुद्दे कि बात तो ये है कि मैं तो अपनों में एक आलोचक के रूप में कुख्यात हूँ, जी आलोचक कभी प्रख्यात नहीं होते है वो तो कुख्यात होते है. सही बात है भैया आलोचना करना कोई सभ्य लोगों का काम थोड़े ही होता है.
अब वो दिन नहीं रहे कि हम बोले कि निंदक निअरे रखिये...अब तो भैया निंदक कुछ बोल कर तो देखे उसके दांत तोड़ दिए जायेंगे, वैसे एक सच ये भी है कि आज कल के निंदक भी निंदक कम जलन के कारण बोलने वाले ज्यादा हो गए है.
चलिए अब हम बंद करते है है क्योंकि पापा कसम लापता गंज का टाइम जो हो गया है.
अब जो लोग हमारी तरह लापता गंज के प्रशंसक है वो लोग तो कहेंगे कि लो मारा डायलाग इसने लापता गंज से चुरा कर, लेकिन दोस्त ये सही बात है कि वाकई व्यंग्य तो पिताजी लिखा करते थे और आज हम लिखने पढने में जो भी है कही ना कही उनके कारण ही है, उनको देख कर ही हमने सिखा है कि अगर हमे अपनी बात व्यंग्यात्मक कहना है तो हम कैसे कह सकते है लेकिन मुद्दे कि बात तो ये है कि मैं तो अपनों में एक आलोचक के रूप में कुख्यात हूँ, जी आलोचक कभी प्रख्यात नहीं होते है वो तो कुख्यात होते है. सही बात है भैया आलोचना करना कोई सभ्य लोगों का काम थोड़े ही होता है.
अब वो दिन नहीं रहे कि हम बोले कि निंदक निअरे रखिये...अब तो भैया निंदक कुछ बोल कर तो देखे उसके दांत तोड़ दिए जायेंगे, वैसे एक सच ये भी है कि आज कल के निंदक भी निंदक कम जलन के कारण बोलने वाले ज्यादा हो गए है.
चलिए अब हम बंद करते है है क्योंकि पापा कसम लापता गंज का टाइम जो हो गया है.
Tuesday, December 22, 2009
फिर देखेंगे हम लोग
हांजी बिलकुल सही पढ़ा आपने, बहुत जल्दी ही हम सब फिर से देखेंगे हम लोग...
आज की पीढ़ी को तो शायद पता ही नहीं होगा की ये हम लोग है किस बला का नाम लेकिन हम जैसे कुछ लोग जिन्हें घर में ठोडा सा साहित्यिक माहौल मिला है उनके मन में जरुर है "हम लोग" की यादें और NDTV इंडिया के हम लोग में हम लोग के पात्र देख कर तो हम लोगों में हम लोग की यादें ताज़ा हो ही गयी है. दूरदर्शन जल्दी ही लाने वाला है हम लोग .
अब देखने वाली वैसे अभी बोले तो सोचने वाली बात ये होगी की बिना दादामुनि और मनोहर श्याम जोशी के हम लोगों को क्या "हम लोग" पसंद आएगा. वैसे अगर पुराने दर्शकों की बात करे तो मुझे लगता है वो लोग "छंद पाकैया..." की कमी जरुर महसूस करेंगे.
१९८४ में तो दर्शक हम लोग के चरित्रों को खुद से जुड़ा हुआ मानते थे अब पता नहीं आज की पीढ़ी खुद को जुड़ा हुआ पाएगी हम लोग से? मुझे ऐसा लगता है की दूरदर्शन जो की आज भी देखा जाता है क्योंकि अभी DTH का उतना प्रचार प्रसार नहीं हुआ है गाँव में, को थोड़ी अपनी मार्केटिंग पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि जो दर्शक उनसे अलग हो गए है वो वापस आ सके. पहले दूरदर्शन को अपनी साख को वापस लाना चाहिए क्योंकि लोगों के मन में ये बात गहराई तक बैठ चुकी है की दूरदर्शन के दूर से ही दर्शन करो.
आप खुद ही सोचिये की अगर लापता गंज दूरदर्शन पर आ रहा होता तो वो कितने दर्शकों तक पहुँच पाता और कितने दर्शक बोलते "पापा कसम बहुत अच्छा प्रोग्राम है..." या "कभी कभी कुछ अच्छे प्रोग्राम्स भी बन जाते है ".
आज की पीढ़ी को तो शायद पता ही नहीं होगा की ये हम लोग है किस बला का नाम लेकिन हम जैसे कुछ लोग जिन्हें घर में ठोडा सा साहित्यिक माहौल मिला है उनके मन में जरुर है "हम लोग" की यादें और NDTV इंडिया के हम लोग में हम लोग के पात्र देख कर तो हम लोगों में हम लोग की यादें ताज़ा हो ही गयी है. दूरदर्शन जल्दी ही लाने वाला है हम लोग .
अब देखने वाली वैसे अभी बोले तो सोचने वाली बात ये होगी की बिना दादामुनि और मनोहर श्याम जोशी के हम लोगों को क्या "हम लोग" पसंद आएगा. वैसे अगर पुराने दर्शकों की बात करे तो मुझे लगता है वो लोग "छंद पाकैया..." की कमी जरुर महसूस करेंगे.
१९८४ में तो दर्शक हम लोग के चरित्रों को खुद से जुड़ा हुआ मानते थे अब पता नहीं आज की पीढ़ी खुद को जुड़ा हुआ पाएगी हम लोग से? मुझे ऐसा लगता है की दूरदर्शन जो की आज भी देखा जाता है क्योंकि अभी DTH का उतना प्रचार प्रसार नहीं हुआ है गाँव में, को थोड़ी अपनी मार्केटिंग पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि जो दर्शक उनसे अलग हो गए है वो वापस आ सके. पहले दूरदर्शन को अपनी साख को वापस लाना चाहिए क्योंकि लोगों के मन में ये बात गहराई तक बैठ चुकी है की दूरदर्शन के दूर से ही दर्शन करो.
आप खुद ही सोचिये की अगर लापता गंज दूरदर्शन पर आ रहा होता तो वो कितने दर्शकों तक पहुँच पाता और कितने दर्शक बोलते "पापा कसम बहुत अच्छा प्रोग्राम है..." या "कभी कभी कुछ अच्छे प्रोग्राम्स भी बन जाते है ".
Friday, December 11, 2009
चाची की चप्पल
आजकल शादियों का सीजन चल रहा है तो हमे भी कुछ शादियों में सम्मिलित होने का मौका मिल रहा है. अब यदि शादी है तो शादी में अलग अलग बातों पर विचार विमर्श भी चलता रहता है जैसे इस लड़की के लिए वो लड़का अच्छा है या उस लड़की के लिए ये लड़का. वैसे कभी कभी कुछ इंटरेस्टिंग किस्से भी निकल कर आ जाते है, आज ही की बात लीजिये मैं एक शादी में बिना काम के व्यस्त हो रहा था तभी चारो ओर से अचानक शोर सुनाई देने लगा और सब लोग (कम से कम मेरे आस पास थे वो लोग तो) एक ही बात कर रहे थे की "चाची की चप्पल" हांजी चाची की चप्पल कहा गयी?
उस समय तो ऐसा लग रहा था जैसे सारा संसार केवल एक ही बात को लेकर चिंतित था की आखिर चाची की चप्पल गयी कहा? कुछ मुद्दे जिन्हें हम अति संवेदनशील समझते है जैसे ग्लोबल वार्मिंग या ग्लोबल आतंकवाद तो चाची की चप्पल के सामने अतिसूक्ष्म नज़र आ रहे थे.
कुछ लोग इस बात को लेकर चर्चा कर रहे थे की कही किसी ने चप्पल चुरा तो नहीं ली, कुछ लोग इस चर्चा में व्यस्त थे ही कही कोई ओर तो नहीं पहन कर तो नहीं चला गया और कुछ लोग तो ये भी बोल रहे थे की कही चाची ही अपनी चप्पल कही भूल तो नहीं आई. इन शोर्ट बोला जाए तो चारो तरफ सिर्फ चाची की चप्पल ही नज़र आ रही थी मतलब नज़र न आते हुए भी नज़र आ रही थी.
मैं तो अपने आलस्य के चलते शादी वाले घर से भाग कर अपने घर आ गया चाची की चप्पल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को बीच में ही छोड़ कर, यहाँ अपने घर आ कर मुझे बहुत अपराधबोध हो रहा है की चाची की चप्पल को कितना बुरा लग रहा होगा अभी की मैं उसको ढूंढे बगैर ही वापस आ गया.
उस समय तो ऐसा लग रहा था जैसे सारा संसार केवल एक ही बात को लेकर चिंतित था की आखिर चाची की चप्पल गयी कहा? कुछ मुद्दे जिन्हें हम अति संवेदनशील समझते है जैसे ग्लोबल वार्मिंग या ग्लोबल आतंकवाद तो चाची की चप्पल के सामने अतिसूक्ष्म नज़र आ रहे थे.
कुछ लोग इस बात को लेकर चर्चा कर रहे थे की कही किसी ने चप्पल चुरा तो नहीं ली, कुछ लोग इस चर्चा में व्यस्त थे ही कही कोई ओर तो नहीं पहन कर तो नहीं चला गया और कुछ लोग तो ये भी बोल रहे थे की कही चाची ही अपनी चप्पल कही भूल तो नहीं आई. इन शोर्ट बोला जाए तो चारो तरफ सिर्फ चाची की चप्पल ही नज़र आ रही थी मतलब नज़र न आते हुए भी नज़र आ रही थी.
मैं तो अपने आलस्य के चलते शादी वाले घर से भाग कर अपने घर आ गया चाची की चप्पल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को बीच में ही छोड़ कर, यहाँ अपने घर आ कर मुझे बहुत अपराधबोध हो रहा है की चाची की चप्पल को कितना बुरा लग रहा होगा अभी की मैं उसको ढूंढे बगैर ही वापस आ गया.
Tuesday, October 27, 2009
लापता गंज का पता
हाँजी तो मिल ही गया "लापता गंज" का पता...
शरद जोशी के बारे में आज की पीढी शायद उतना नही जानती हो पर हम जानते है और ये बात हम गर्व से कह सकते है । शरद जोशी जी से हमारी मुलाकात हमारी बाल भरती ने करवाई थी । आज भी हमे याद है "जीप पर सवार तीन इल्लियाँ " जिसने हमारे मन में एक बात बैठाई थी की कैसे सरकारी पदका दुरूपयोग किया जाता है जो की शायद बाद में इस बात में तब्दील होता गया की कैसे दुरूपयोग किया जा सकता है :)
हम इस बात को लेकर शरद जोशी के शुक्रगुजार है कि उन्होंने हमे एक सच्चाई से बड़े ही सही तरीके अवगत करवाया। शरद जोशी जी व्यंग्य में एक बात जो हमे बहुत पसंद है वो ये है कि अपनी बात को कितने सरल तरीके से कहा जा सकता है ।
लापता गंज कि अभी तो शुरुआत है , देखे आगे आगे क्या होता है? अभी तो देख कर ऐसा लगा है कि हमे कुछ अच्छे और कुछ लाउड लोगो को देखने को मिलेगा , अब निर्देशक महोदय इन सबको साथ ले कर शरद जोशी कि रचनाओ के साथ कितना न्याय कर पाते है ये तो कुछ समय बाद ही पता लगेगा ।
वैसे एक अच्छी बात है इस "लापता गंज " में कि इसका पता नेहा जोशी को है इसलिए शायद हमको इस धारावाहिक को काफी दिनों तक देखने को मिलेगा और घर कि बात घर में ही रहेगी।
शरद जोशी के बारे में आज की पीढी शायद उतना नही जानती हो पर हम जानते है और ये बात हम गर्व से कह सकते है । शरद जोशी जी से हमारी मुलाकात हमारी बाल भरती ने करवाई थी । आज भी हमे याद है "जीप पर सवार तीन इल्लियाँ " जिसने हमारे मन में एक बात बैठाई थी की कैसे सरकारी पदका दुरूपयोग किया जाता है जो की शायद बाद में इस बात में तब्दील होता गया की कैसे दुरूपयोग किया जा सकता है :)
हम इस बात को लेकर शरद जोशी के शुक्रगुजार है कि उन्होंने हमे एक सच्चाई से बड़े ही सही तरीके अवगत करवाया। शरद जोशी जी व्यंग्य में एक बात जो हमे बहुत पसंद है वो ये है कि अपनी बात को कितने सरल तरीके से कहा जा सकता है ।
लापता गंज कि अभी तो शुरुआत है , देखे आगे आगे क्या होता है? अभी तो देख कर ऐसा लगा है कि हमे कुछ अच्छे और कुछ लाउड लोगो को देखने को मिलेगा , अब निर्देशक महोदय इन सबको साथ ले कर शरद जोशी कि रचनाओ के साथ कितना न्याय कर पाते है ये तो कुछ समय बाद ही पता लगेगा ।
वैसे एक अच्छी बात है इस "लापता गंज " में कि इसका पता नेहा जोशी को है इसलिए शायद हमको इस धारावाहिक को काफी दिनों तक देखने को मिलेगा और घर कि बात घर में ही रहेगी।
Friday, June 26, 2009
मेरे शहर में मानसून
तो आखिरकार मेरे शहर में मानसून ने दस्तक दे ही दी ... यह एक बहुत सुकून देने वाला अहसास है । अभी जब में ये बात आप लोगो से कह रहा हूँ तब भी बाहर बरसात हो रही है और मैं बुद्धू बक्से में रामायण का अन्तिम एपिसोड देख रहा हूँ । दिन भर की थकान के बाद अब मुझे उबासी भी आ रही है साथ ही ठंडी ठंडी हवा मेरे आलस को और बड़ा रही है लेकिन मैं अभी सोना नहीं चाहता हूँ । पता नहीं क्यों लेकिन अभी नहीं...
आज शाम को मैं काम से बाज़ार गया था तब मुझे लगा की क्या कारण है की मैं इस शहर को नहीं छोड़ना चाहता हूँ , ठंडी ठंडी हवा चल रही थी , आसमान में ना अँधेरा था न उजाला एक अलग ही रंग में रंगा हुआ था आसमान मानो आज एक नए रंग की रचना करना चाहता हो जैसे और भोपाल में अब भी कुछ हरियाली आधुनिकता की बलि नहीं चढ़ पायी है तो वो भी अपना योगदान देना एक कर्तव्य के रूप में ले रही थी।
कुल मिला कर एक बहुत अच्छे मौसम की बात मैं यहाँ करना चाहता हूँ जिसका आज मैं साक्षी बना हूँ । अब मैं यही उम्मीद कर सकता हूँ एक भोपाली होते हुए कि जल्द से जल्द इस शहर की शान हमारी बड़ी झील फिर से अपने पुराने स्वरुप में लौट आए और किसी दिन तेज़ बरसात में मैं बड़ी झील के किनारे बैठ कर बरसात होते हुए देख सकूँ।
आज शाम को मैं काम से बाज़ार गया था तब मुझे लगा की क्या कारण है की मैं इस शहर को नहीं छोड़ना चाहता हूँ , ठंडी ठंडी हवा चल रही थी , आसमान में ना अँधेरा था न उजाला एक अलग ही रंग में रंगा हुआ था आसमान मानो आज एक नए रंग की रचना करना चाहता हो जैसे और भोपाल में अब भी कुछ हरियाली आधुनिकता की बलि नहीं चढ़ पायी है तो वो भी अपना योगदान देना एक कर्तव्य के रूप में ले रही थी।
कुल मिला कर एक बहुत अच्छे मौसम की बात मैं यहाँ करना चाहता हूँ जिसका आज मैं साक्षी बना हूँ । अब मैं यही उम्मीद कर सकता हूँ एक भोपाली होते हुए कि जल्द से जल्द इस शहर की शान हमारी बड़ी झील फिर से अपने पुराने स्वरुप में लौट आए और किसी दिन तेज़ बरसात में मैं बड़ी झील के किनारे बैठ कर बरसात होते हुए देख सकूँ।
Thursday, June 18, 2009
रामायण - एक भव्य गाथा का समापन
हाँ भइया ख़बर ये है की एक और अच्छे धारावाहिक का समापन होने जा रहा है। भाई रामायण का आखरी एपिसोड जल्द ही प्रसारित होने वाला है। रामायण एक ऐसी महागाथा है जो आपको बहुत कुछ सिखाती है। आप इस महागाथा के हर सन्दर्भ से कुछ न कुछ सिख सकते है , लेकिन अब और नही अब तो भइया राखी सावंत का स्वयंवर होने वाला है और हमे उसे दिखाया जाएगा। देखना न देखना तो हमारे ऊपर ही है लेकिन...
मुझे ये समझ नही आता है की आज भी लोग कुछ अच्छा देखना चाहते है तो क्यों ये चैनल वाले कुछ अच्छा दिखाने से परहेज करते है? कोई कुछ भी बोले मैं तो ये नही मान सकता की ये स्वयंवर एक अच्छा आईडिया है, अगर आपको कुछ अलग और अच्छा करना ही था तो आप भी स्टार प्लस के जैसे कोई मेट्रीमोनी कार्यक्रम दिखा सकते थे।
एक महागाथा का रिप्लेसमेंट कुछ तो स्तरवाला होना चाहिए था। अब भले ही मैं बिना देखे अपनी प्रतिक्रिया दे कर ग़लत कर रहा होऊंगा लेकिन मैं यह नही मान सकता की एक एक अच्छी पहल है। काश की हमे इस बात की आज़ादी होती की हम सीधे इस तरह के सो कॉल्ड रियलिटी शो का खुले आम विरोध कर चैनल वालो को कुछ तो अच्छा दिखाने पर मजबूर कर देते।
मुझे ये समझ नही आता है की आज भी लोग कुछ अच्छा देखना चाहते है तो क्यों ये चैनल वाले कुछ अच्छा दिखाने से परहेज करते है? कोई कुछ भी बोले मैं तो ये नही मान सकता की ये स्वयंवर एक अच्छा आईडिया है, अगर आपको कुछ अलग और अच्छा करना ही था तो आप भी स्टार प्लस के जैसे कोई मेट्रीमोनी कार्यक्रम दिखा सकते थे।
एक महागाथा का रिप्लेसमेंट कुछ तो स्तरवाला होना चाहिए था। अब भले ही मैं बिना देखे अपनी प्रतिक्रिया दे कर ग़लत कर रहा होऊंगा लेकिन मैं यह नही मान सकता की एक एक अच्छी पहल है। काश की हमे इस बात की आज़ादी होती की हम सीधे इस तरह के सो कॉल्ड रियलिटी शो का खुले आम विरोध कर चैनल वालो को कुछ तो अच्छा दिखाने पर मजबूर कर देते।
Monday, June 15, 2009
ये जो है ज़िन्दगी या ये घर की बात है...
हाँ जी तो बताइए की ये जो है ज़िन्दगी या ये घर की बात है? सन् १९८४ में स्वर्गीय श्री शरद जोशी द्वारा लिखित और एस एस ओबेराई एवं रमन कुमार (तारा फेम) द्वारा निर्देशित "ये जो है ज़िन्दगी" को भूल पाना थोड़ा मुश्किल काम है और हम जैसे लोग तो शायद भूलना भी नही चाहेगे हलाँकि अगर मैं अपनी बात करू तो मुझे इस धारावाहिक की बहुत धुंधली यादें है लेकिन वो यादें भी इस धारावाहिक को ना भूलने के लिए काफ़ी है।
रणजीत वर्मा (स्वर्गीय श्री शफी इनामदार)उनकी पत्नी रेणू वर्मा (स्वरुप संपत) उनका साला राजा(राकेश बेदी) उनका बॉस (टिकू तलसानिया ) और उनके बंगाली पड़ोसियों (विजय कश्यप और सुलभा आर्य ) के चारो ओर घुमती ज़िन्दगी और इन जिंदगियों को एक सूत्र में पिरोते सतीश शाह , कौन भूल सकता है इन चरित्रों को? हर कलाकार एक से बड़कर एक और ऊपर से शरद जोशी के व्यंग्य ,आख़िर क्यों भूले हम इस धारावाहिक को?
ये वही धारावाहिक है जिसने टिकू तलसानिया को "ये क्या हो रहा है ?" और सतीश शाह ने "व्हाट ऐ रिलीफ" और "तीस साल का एक्सपेरिएंस है" जैसे डाय्लोग दिए। शायद आपको जान कर आश्चर्य हो की सारे धारावाहिक में एक कैमरा सेट अप किया गया था और इस धारावाहिक के कोई पायलट एपिसोड नही थे।
अब बात करे "घर की बात है " की,वैसा ही परिवार जिसमे एक पति राजदीप याग्निक (सुमीत राघवन),एक पत्नी राधिका याग्निक (जूही बब्बर ) उनका साला काकू उर्फ़ कपिल कुमार (स्वप्निल जोशी ) और पड़ोसी मिस्टर एंड मिसेस वालिया (जयति भाटिया और देवेन मुंजाल) है और इस बार इन्हे एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहे है अली असगर। वैसे हमे इन कलाकारों की योग्यता पर कोई शक नही है पर फिर भी इस घर की बात में वो बात नही नज़र नही आती है जो कि उस ज़िन्दगी में थी। आज के दौर में आधुनिकता तो है पर वो सादगी वो बंधन नज़र नही आता है। खैर अब तो घर कि बात भी पुरानी हो चली है, पता नही क्यों लेकिन चैनल वालों को अच्छे धारावाहिक अच्छे नही लगते है तभी तो घर कि बात है का भी हश्र भी साराभाई वर्सेस साराभाई और जस्सुबेन जयंतीलाल जोशी कि जोइंट फॅमिली जैसा ही हुआ।
रणजीत वर्मा (स्वर्गीय श्री शफी इनामदार)उनकी पत्नी रेणू वर्मा (स्वरुप संपत) उनका साला राजा(राकेश बेदी) उनका बॉस (टिकू तलसानिया ) और उनके बंगाली पड़ोसियों (विजय कश्यप और सुलभा आर्य ) के चारो ओर घुमती ज़िन्दगी और इन जिंदगियों को एक सूत्र में पिरोते सतीश शाह , कौन भूल सकता है इन चरित्रों को? हर कलाकार एक से बड़कर एक और ऊपर से शरद जोशी के व्यंग्य ,आख़िर क्यों भूले हम इस धारावाहिक को?
ये वही धारावाहिक है जिसने टिकू तलसानिया को "ये क्या हो रहा है ?" और सतीश शाह ने "व्हाट ऐ रिलीफ" और "तीस साल का एक्सपेरिएंस है" जैसे डाय्लोग दिए। शायद आपको जान कर आश्चर्य हो की सारे धारावाहिक में एक कैमरा सेट अप किया गया था और इस धारावाहिक के कोई पायलट एपिसोड नही थे।
अब बात करे "घर की बात है " की,वैसा ही परिवार जिसमे एक पति राजदीप याग्निक (सुमीत राघवन),एक पत्नी राधिका याग्निक (जूही बब्बर ) उनका साला काकू उर्फ़ कपिल कुमार (स्वप्निल जोशी ) और पड़ोसी मिस्टर एंड मिसेस वालिया (जयति भाटिया और देवेन मुंजाल) है और इस बार इन्हे एक सूत्र में पिरोने का काम कर रहे है अली असगर। वैसे हमे इन कलाकारों की योग्यता पर कोई शक नही है पर फिर भी इस घर की बात में वो बात नही नज़र नही आती है जो कि उस ज़िन्दगी में थी। आज के दौर में आधुनिकता तो है पर वो सादगी वो बंधन नज़र नही आता है। खैर अब तो घर कि बात भी पुरानी हो चली है, पता नही क्यों लेकिन चैनल वालों को अच्छे धारावाहिक अच्छे नही लगते है तभी तो घर कि बात है का भी हश्र भी साराभाई वर्सेस साराभाई और जस्सुबेन जयंतीलाल जोशी कि जोइंट फॅमिली जैसा ही हुआ।
Sunday, June 14, 2009
ताना ना ना ताना ना ना ना...
कभी-कभी हमे अपने मस्तिष्क की गति पर आश्चर्य करना पड़ता है, आज ही की बात ले लीजिये, आज मैं एक हिन्दी मूवी देख रहा था और उस मूवी में रत्नागिरी नाम के एक स्थान का सन्दर्भ आया तो मेरे जेहन में अचानक "अमरावती की कथायें " नाम के धारावाहिक की यादें ताज़ा हो गई। श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित यह धारावाहिक साहित्य अकादमी अवार्ड जीती हुई कहानियों पर आधारित थाअब अगर उस दौर के धारावाहिकों की बात चल रही है तो भला "मालगुडी डेस" का जिक्र न हो तो कुछ अधुरा तो लगेगा ही, आपको शायद न लगे लेकिन मुझे जरुर लगेगा। मालगुडी डेस , स्वर्गीय श्री शंकर नाग द्वारा निर्देशित यह धारावाहिक कर्नाटक के शिमोगा जिले के अगुम्बे में फिल्माया गया था। एल विद्यानाथन द्वारा संगीतबद्ध इस धारावाहिक का टाइटल गीत आज भी उतनी ही सुखद अनुभूति देता है जितनी की उस समय देता था।
मुझे आज भी याद है मैं पुणे में एक इंटर-वियु देने गया था तब अचानक मैंने किसी के रिंग टोन के रूप में मालगुडी डेस का गाना सुना था तो मेरा ध्यान पुरे समय इस बात पर ही लगा रहा की कैसे मैं उससे यह रिंग टोन मांगू।
मिठाई वाला हो या स्वामी हो हम आज भी उन चरित्रों को अपना सा मानते है और कही ना कही अपनी ज़िन्दगी में खोजने की एक असफल सी कोशिश करते है , ये जानते हुए कि हम शायद स्वामी की उस सच्चाई को छू भी ना पाये। सुनने में आया है की शायद दूरदर्शन इस धारावाहिक को फिर से फिल्माना चाहता है। वैसे तो परिवर्तन ही इस दुनिया की एकमात्र स्थिर चीज़ है लेकिन कुछ बातें अपरिवर्तनीय ही अच्छी लगती है और एल दर्शक के नज़रिए से मुझे भी शायद ये परिवर्तन रास न आए क्योंकि कुछ पुराने धारावाहिकों का नया स्वरुप उतना प्रभावशाली नही रहा है। खैर देखते है क्या होता है, तब तक गुनगुनाते रहिये ताना ना ताना ना ना ना...
मुझे आज भी याद है मैं पुणे में एक इंटर-वियु देने गया था तब अचानक मैंने किसी के रिंग टोन के रूप में मालगुडी डेस का गाना सुना था तो मेरा ध्यान पुरे समय इस बात पर ही लगा रहा की कैसे मैं उससे यह रिंग टोन मांगू।
मिठाई वाला हो या स्वामी हो हम आज भी उन चरित्रों को अपना सा मानते है और कही ना कही अपनी ज़िन्दगी में खोजने की एक असफल सी कोशिश करते है , ये जानते हुए कि हम शायद स्वामी की उस सच्चाई को छू भी ना पाये। सुनने में आया है की शायद दूरदर्शन इस धारावाहिक को फिर से फिल्माना चाहता है। वैसे तो परिवर्तन ही इस दुनिया की एकमात्र स्थिर चीज़ है लेकिन कुछ बातें अपरिवर्तनीय ही अच्छी लगती है और एल दर्शक के नज़रिए से मुझे भी शायद ये परिवर्तन रास न आए क्योंकि कुछ पुराने धारावाहिकों का नया स्वरुप उतना प्रभावशाली नही रहा है। खैर देखते है क्या होता है, तब तक गुनगुनाते रहिये ताना ना ताना ना ना ना...
Saturday, June 13, 2009
जैसा की सोचा था...
कल रात का जागरण आख़िरकार बेकार गया :( और भारत हमेशा की तरह "करो या मरो" में पड़ने की अपनी आदत पर लौट आया है। अब तक तो कप्तान साब की चतुराई की हर तरफ़ तारीफ़ हो रही थी और इसमे कोई दो-राय भी नही है की हमारे कप्तान साब एक अच्छे खिलाड़ी है लेकिन मुझे ऐसा लगता है अपने सीनियर खिलाड़ियों का सम्मान न करके उन्होंने ग़लत ही किया है। आप अगर टीम के कप्तान हो तो आपको सब लोगों को साथ में रख कर चलना आना चाहिए न की किसी के अनुभव को नज़र अंदाज़ करके टीम में सिर्फ़ अपने वर्चस्व को साबित करना।
कोई कुछ भी बोले हम तो मानते है की हमारे कप्तान साब ने कुछ फैसले ग़लत ही लिए है , अब भइया सचिन तेंदुलकर ने अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए ही टी २० से अपना नाम वापस लिया है नही तो उनका हश्र भी बाकी सिनिअर्स जैसा हो जाता क्योंकि हमारे सिनिअर्स में कितना दम है ये तो वो लोग आई पी एल में साबित कर ही चुके है।
कप्तान साब अभी तक तो आपकी किस्मत ने आपका साथ दिया है लेकिन हर बार नही और जो नीचे होता है वो ऊपर जरुर आता है इसलिए जो ऊपर है उसे नीचे आना ही पड़ेगा। सफलता हर समय आपके साथ नही रहेगी , इस बात को हमेशा ध्यान में रख कर अपने आधार को कभी भूलना नही चाहिए।
कोई कुछ भी बोले हम तो मानते है की हमारे कप्तान साब ने कुछ फैसले ग़लत ही लिए है , अब भइया सचिन तेंदुलकर ने अपने सम्मान की रक्षा करने के लिए ही टी २० से अपना नाम वापस लिया है नही तो उनका हश्र भी बाकी सिनिअर्स जैसा हो जाता क्योंकि हमारे सिनिअर्स में कितना दम है ये तो वो लोग आई पी एल में साबित कर ही चुके है।
कप्तान साब अभी तक तो आपकी किस्मत ने आपका साथ दिया है लेकिन हर बार नही और जो नीचे होता है वो ऊपर जरुर आता है इसलिए जो ऊपर है उसे नीचे आना ही पड़ेगा। सफलता हर समय आपके साथ नही रहेगी , इस बात को हमेशा ध्यान में रख कर अपने आधार को कभी भूलना नही चाहिए।
Friday, June 12, 2009
सुपर ८ में भारत
हाँ तो भइया रात के पौने बारह बज रहे है और हम एक सच्चे देशभक्त की तरह भारत-वेस्ट इंडीज का टी २० मुकाबला देख रहे है। वैसे युसूफ पठान की पारी ने कुछ हद तक भारत को मुकाबले में ला दिया है नही तो हमारे खिलाड़ियों ने क्रिस गेल को एक आसन सा लक्ष्य देने का मन बना लिया था , लेकिन देखिये युसूफ पठान में तो जैसे बिल्कुल टीम भावना नही है तभी तो शायद उन्होंने कहा की नही अगर वेस्ट इंडीज को ये मैच जितना है तो उनको थोडी मेहनत करनी ही पड़ेगी।
अरे ये क्या ? अब तो इरफान पठान भी अपने भाई का साथ देने लगे और टीम से बगावत करने हुए अपने पहले ही ओवर में फ्लेचर को आउट कर दिया... अब शायद कप्तान साब उन्हें इस मैच में दुबारा बोलिंग का मौका नही देगे।
चलिए देखते है अब क्या होता है...
अरे ये क्या ? अब तो इरफान पठान भी अपने भाई का साथ देने लगे और टीम से बगावत करने हुए अपने पहले ही ओवर में फ्लेचर को आउट कर दिया... अब शायद कप्तान साब उन्हें इस मैच में दुबारा बोलिंग का मौका नही देगे।
चलिए देखते है अब क्या होता है...
मेरी स्थगित यात्रा
पिछले कुछ महीनों से मुझे कुछ बदलाव चाहिए था तो सोचा की शिर्डी हो आऊं, बाबा के दर्शन भी हो जायेंगे और एक ढर्रे पर चल रही ज़िन्दगी को थोड़ा सा बदलाव भी मिल जाएगा, लेकिन वो कहते है ना की जब तक बाबा न बुलाए आप उनसे मिलने नहीं जा सकते हो, ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ, शायद अभी मेरा बाबा से साक्षात्कार का समय नहीं आया था और इसलिए उन्होंने मुझे अभी मिलने नहीं बुलाया।
पुराने ज़माने में जैसे लोग कठीन यात्रा कर देव दर्शन को जाते थे आजकल ऐसा नहीं होता है और शायद एक आम आदमी की तरह मैं भी थोड़ा सा स्वार्थी हो गया था और मैंने तय किया था कि अगर हमारी भारतीय रेल मुझे एक आरामदायक यात्रा का सुख देगी तो ही मैं इस यात्रा पर जाऊँगा अन्यथा बाकी लोगों की तरह बाबा के अभी ना बुलाने का बहाना कर दूंगा।
खैर अब एक पुख्ता इंतजाम के साथ अपनी अगली यात्रा का कार्यक्रम बनाऊंगा ताकि बाबा के नाम से कोई बहाना ना बनाना पड़े और मुझे भी थोड़ा सा सुकून मिल जाए अपनी रूटीन ज़िन्दगी से...
पुराने ज़माने में जैसे लोग कठीन यात्रा कर देव दर्शन को जाते थे आजकल ऐसा नहीं होता है और शायद एक आम आदमी की तरह मैं भी थोड़ा सा स्वार्थी हो गया था और मैंने तय किया था कि अगर हमारी भारतीय रेल मुझे एक आरामदायक यात्रा का सुख देगी तो ही मैं इस यात्रा पर जाऊँगा अन्यथा बाकी लोगों की तरह बाबा के अभी ना बुलाने का बहाना कर दूंगा।
खैर अब एक पुख्ता इंतजाम के साथ अपनी अगली यात्रा का कार्यक्रम बनाऊंगा ताकि बाबा के नाम से कोई बहाना ना बनाना पड़े और मुझे भी थोड़ा सा सुकून मिल जाए अपनी रूटीन ज़िन्दगी से...
Wednesday, June 10, 2009
माफ़ कीजियेगा...
वैसे तो शायद ही कोई मेरे ब्लॉग को देखता होगा फिर भी मैं माफ़ी चाहता हूँ कि कुछ तकनिकी कारणों के चलते मुझे अपने ब्लॉग के सारे पोस्ट डिलीट करने पड़े। हालाँकि इससे किसी को कोई फर्क नही पड़ेगा लेकिन मैं तो संतुष्ट हो जाऊँगा कि मैं माफ़ी मांग ली और इससे ये भी लगेगा कि कोई ना कोई तो मेरा ब्लॉग पड़ता ही होगा, अब भले ही "दिल को बहलाने के लिए ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब..." वैसे मुझे अपनी कुछ पोस्ट कि कमी जरुर खलेगी लेकिन कभी-कभी कुछ बातों पर आपका बस नही चल पाता है क्या करे...
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About Me
- Aditya Dubay
- हर जगह ये पूछा जाता है कि अपने बारे मे बताइए (About me), हम ये सोचते है की जो हमें जानते है उन्हें अपने बारे मे बताना ग़लत होगा क्योंकि वो हमें जानते है और जो हमें नही जानते उन्हे हम बता कर क्या करेंगे की हम कौन है | जो हमें नही जानता क्या वो वाकई हमें जानना चाहता है और अगर जानना चाहता है तो उसे About me से हम क्या बताये क्योंकि हम समझते है बातचीत और मिलते रहने से आप एक दूसरे को बेहतर समझ सकते हो About Me से नही | वैसे एक बात और है हम अपने बारे मे बता भी नही सकते है क्योंकि हमें खुद नही पता की हम क्या है ? हम आज भी अपने आप की तलाश कर रहे है और आज तक ये नही जान पायें हैं की हम क्या है? अब तक का जीवन तो ये जानने मे ही बीत गया है की हमारे आस पास कौन अपना है और कौन पराया ? ये जीवन एक प्रश्न सा ज़रूर लगता है और इस प्रश्न को सुलझाने मे हम कभी ये नही सोच पाते है की हम कौन है? कुछ बातें सीखने को भी मिली जैसे आपका वजूद आपके स्वभाव या चरित्र से नही बल्कि आपके पास कितने पैसे है उससे निर्धारित होता है | कुछ लोग मिले जो कहते थे की वो रिश्तों को ज़्यादा अहमियत देते है लेकिन अंतत: ... बहुत कुछ है मन मे लिखने के लिए लेकिन कुछ बातें या यू कहें कुछ यादें आ जाती है और मन खट्टा कर जाती है तो कुछ लिख नही पाते हैं |